टिहरी झील महोत्सव एक संस्मरण – भाग 1

टिहरी झील महोत्सव एक संस्मरण

 

मन की संवेदनाओं को छेड़ता एक महोत्सव, जो झील में डूबे टिहरी शहर की जीवंतता की याद दिलाता रहता है । हर बार टिहरी आगमन पर कुछ आँखों में कुछ नमी अनायास ही आ जाती थी, साथ ही आ जाती थीं वो यादें जो टिहरी में रहकर बितायीं थी । जब टिहरी में थे तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इस तरह से टिहरी जलमग्न होगी । कहाँ दोबट्टा और कहाँ राजा का महल , जब कोई कहता कि सब पानी में डूब जायेगा तो लगता था कि खेल है क्या? धीरे धीरे २००५ के बाद जब टिहरी को पानी के आगोश में समाते हुए देखा तो आँखें यूँ ही भर आयीं । न जाने क्यूँ ऐसा कुछ लगाव सा हो गया था इस शहर से । मेरी सिनेमाघर में पहली मूवी, वो घूमना फिरना, सिंगोरी और न जाने क्या क्या सब कुछ डूब गया । रह गयी तो सिर्फ यादें …. ।

धीरे धीरे पूरा टिहरी जलसमाधि ले चूका था । मै भी अपनी दुनिया में व्यस्त रहने लगा था । अब टिहरी यदा कदा ही आना हुआ करता था । क्या करें जितनी बार भी टिहरी आओ आँखे भर आती थी । फिर अचानक २०१५ में टिहरी जल महोत्सव की शुरुआत हुई । सुनकर बहुत अच्छा लगा कि कुछ तो नया हो रहा है । बहुत ही शानदार, रंगारंग प्रस्तुतियां और रोमांच भरा था यह टिहरी जल महोत्सव… । चाहे बात राफ्टिंग की हो या पैराग्लाइडिंग की सरकार की ओर से पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए भरसक प्रयास किये गये । पर न जाने क्यूँ हमेशा यही लगा कि सरकार के निरंतर प्रयासों के बावजूद टिहरी को महोत्सव के अलावा पर्यटक मिले ही नहीं ।

फिर तो यह महोत्सव उत्तराखंड सरकार का पर्यटन विकास को बढ़ावा देने की मुख्यधारा में आने लगा । २०१६ और २०१७ में कार्य की व्यस्तता के चलते मै इस महोत्सव में आ नहीं पाया । पर कब तक दूर रहता अपने इस प्यारे टिहरी से?

२०१८ में ज्ञात हुआ कि इस बार टिहरी जल महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है । राज्य के कई नामचीन लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के झरोखों के साथ पर्यटकों का मनोरंजन कर रहे हैं । इस बार तो ठान ली कि चाहे कुछ हो जाये इस बार किसी लम्हे को हाथ से नहीं जाने देना है । टिहरी की यादों को दिल में बसा एक बार मै आ पंहुचा टिहरी झील महोत्सव में ।

पहली बार जब यह जल महोत्सव हुआ था तो झील का जलस्तर काफी अधिक था । इस बार झील का जलस्तर काफी कम लग रहा था लेकिन अभी भी पूरा का पूरा टिहरी इसके अन्दर ही था । कहीं कोई नामोनिशान नहीं बढे हुए जलस्तर के निशान झील के चारों तरफ साफ़ देखे जा सकते थे । दो पृथक भागों बंटा था इस बार का टिहरी महोत्सव । जहाँ एक ओर रोमांच और साहसिक खेलों को बढ़ावा मिल रहा था वहीँ दूसरी ओर सांस्कृतिक संध्याओं में टिहरी रमता नजर आ रहा था ।

मैंने बिना ज्यादा समय बिताते हुए कोतुहलता के साथ सभी साहसिक खेलों का जायजा लेना शुरू कर दिया । बस जानना था इस बार क्या नया है?

काफी रोमांचक खेल थे पानी के जिनमे राफ्टिंग, वाटर स्कीइंग, जेट स्कीइंग, कायाकिंग, वाटर ज़ोर्बिंग, पैरा सेलिंग, और बोटिंग साथ ही पैरा ग्लाइडिंग, रॉक जोमारिंग और रैपलिंग मुख्य थे । एक और मुख्य आकर्षण था स्कूबा डाइविंग।

सच में बेहद ही सुन्दर दृश्य भिन्न भिन्न प्रकार की जल क्रीड़ाये इस अनोखी झील में । लग रहा था जैसे हिमालय की गोद में इन्ही पलों को जीने के लिए निर्माण हुआ हो टिहरी झील का ।

मैंने अपनी टीम के साथ मिलकर राफ्टिंग की और लगभग बीच झील में हमारी पूरी टीम झील में कूद चुकी थी । वाह ! क्या अहसास था (बिना लाइफ जैकेट के झील में कूदना बेवकूफी है इसलिए यदि कोई भी झील में पानी का आनंद लेना चाहता है तो लाइफ जैकेट जरुर पहने) ।

झील के सुन्दर मनमोहक रोमांचकारी वातावरण में कब समय बीता पता ही न चला।  समय हो चला था गंगा आरती का हमें स्कूल के दिनों से यही पढाया गया था कि भागीरथी को अलकनंदा से संगम के पश्चात् ही गंगा के नाम से जाना जाता है तो उस हिस्साब से टिहरी में भागीरथी आरती होनी चाहिए.. बड़ा ही मनमोहक सा दृश्य था हमेशा यही लगता रहा कि रात भर इसी तरह पूजा होती रहे और दीयों के बीच टिहरी झील जगमगाती रहे । झील पूरी चांदनी में जगमगाती कृत्रिम रोशनी में ऐसे लग रही थी मानो कोई दुल्हन अपनी सारी खूबसूरती को चांदनी के प्रकाश में बिखेर रही हो। उसके ऊपर जब पंक्तिवर दीपों के साथ पूजा अनुष्ठान किया गया तो अद्भुत लगा । इससे पहले ऐसा मंजर वाराणसी में देखा था ।

अब बारी थी टिहरी की यादों को ताज़ा करने की और इसमें मदद की पुराना दरबार ट्रस्ट के लगे पंडाल ने। टिहरी से जुडी तस्वीरें, तलवारें, बर्तन, सिक्के, बंदूकें, लेख भांति भांति की अस्त्र और शस्त्र टिहरी की यादों को समेटे हुए थे । पुख्ता जानकारी लेने के बाद मैंने सांस्कृतिक सन्ध्या पंडाल में प्रवेश किया।

सांस्कृतिक सन्ध्या में वीर भड़ माधो सिंह भंडारी की शौर्य गाथा नाटिका देखने का मौका मिला । नाटिका की पटकथा,संवाद ,प्रस्तुतीकरण,तकनिकी, अभिनय ने इतना मंत्रमुग्ध किया कि आरम्भ से अंतिम छ्ण का समय कब बिता पता ही नहीं चला,माधो सिंह भंडारी की सम्पूर्ण जीवन गाथा के मंचन में चर्चित अभिनेता बलदेव राणा, राजेंद्र रावत ,गीता नेगी व अन्य सभी कालकरों का दमदार अभिनय सभी दर्शकों को भावविह्वल,अपनी थाती माटी के स्वाभिमान से ओतप्रोत कर गया और माधो सिंग के बेटे गजे सिंह के त्याग बलिदान के दृस्य से कितने ही लोगों की आंखों में अश्रु धारा बहते हुई मैने देखीं।इस नाटिका का संगीत पक्ष भी बहुत मजबूत है । इस प्रकार के बेहतरीन नाटक व फिल्मे बनाने से हमारी गौरवशाली सँसकृति को राज्य व रास्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान मिलेगी।

इस सबके बाद उत्तराखंड के जागर सम्राट प्रीतम जी की जागरों के साथ कब 12 बज गए पता ही न चला । अद्भुत था यह पहला दिन टिहरी जल महोत्सव का लेकिन अभी और बाकी था मै अपने कैंप में आके विश्राम करने लगा अच्छा ये बताना भूल गया कि इस बार सरकार के द्वारा कैंप की व्यवस्था भी की गयी थी एकदम शांत हो गयी थी टिहरी । ऊपर आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे मानों शहरों से दूर इस अनुपम दृश्य के लिए मुझे खिझा रहे हों फिर कब आँख लग गयी पता ही न चला ।

 

                                                                                                                                                                                                       शेष भाग 2 में ...

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