मौण मेला उत्तराखंड का फिश फेस्टिवल( Fish Festival) – Maun Festival 2018

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मसूरी: जौनपुर विकासखंड में  मौण मेला “भींड का राजमौण ” इस वर्ष अगलाड़ नदी पर सामूहिक रूप से 28 जून को मनाया जाएगा।  इस त्योहार में अगलाड़ नदी पर सामूहिक रूप से मछलियॉँ पकड़ने की परंपरा है।

मौण मेला को मानाने के मुख्य बिन्दु :

  • त्योहार भींड का राजमौण 28 जून को होगा।
  • जौनपुर विकासखंड (मसूरी)से होकर बहने वाली अगलाड़ नदी पर  मौण मेला Maun Festival टिहरी रियासत काल के शुरुआती दिनों से ही मनाया जा रहा है।
  • मेले को राजमौण इस लिए कहा जाता है की टिहरी रिसासत के राजा या राज प्रतिनिधि के मेले में  मौजूद रहने की भी परंपरा थी।
  • वहीं स्थानीय बोलचाल में नदी के आखिरी  छोर को भींड कहा जाता है। क्योंकि यह त्योहार अगलाड़ नदी के अंतिम छोर पर मनाया जाता है। इसलिए इस मौण को भींड कामौण भी कहा जाता है,
  • पूर्व में अगलाड़ नदी के ऊपरी हिस्सों में भी अलग-अलग दूरी पर मंझमौण और घुराणू के मौण मनाए जाते थे, लेकिन अब वो इतिहास बन चुके हैं, जबकि राजमौण की परंपरा को ग्रामीणों ने अब तक जीवित रखा है।
  • परंपरा के अनुसार मेले में दोपहर के समय जब आस पास के सभी लोग एकत्रित हो जाते हैं फिर अगलाड़ नदी के मौणकोट नामक तोक से टिमरू पाउडर पूरे पांतीदार प्रतिनिधियों की मौजूदगी में पारंपरिक गाजे-बाजे के साथ नदी के पानी में मिलाया जाता है। टिमरू पाउडर के नदी में घुलते ही असर दिखना शुरू हो जाता है ।
  • टिमरू पाउडर के नदी में घुलते ही मछलियों के बेहोश होने का सिलसिला सुरु हो जाता है और मौणाई मछलियां पकड़कर अपनी मछोनियां भरनी शुरू कर देते हैं।
  • टिमरू पाउडर बनाने कर काम हर बार अलग अलग पट्टी को दिया जाता है  जिसमें लालूर, भूटगांव, सिलवाड़, अठज्यूला और छैज्यूला की उप पट्टी सिलगांव है लेकिन इस बार छैज्यूला पट्टी की उपपट्टी सिलगांव के जिम्मे टिमरू पाउडर बनाने का काम: टिमरू की छाल और इसके दानों से महीन पाउडर को मौण कहा जाता है। पट्टी में जिसमें सैंजी, भटोली, भेडियाणा, गांवखेत, घंडियाला, सरतली, कसोन, कांडा, पाली, बनोगी, कांडीखाल, चम्या, तिमलियालगांव समेत 19 गांव शामिल हैं।

फिशिंग मौन मेला

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस बार खूब मछलियां पकड़ी जाएंगी। क्योंकि यमुना नदी का पानी प्री-मानसून की बारिश से मटमैला हो रहा है और यमुना नदी की मछलियां अगलाड़ नदी के ताजे पानी का रुख करना शुरू कर चुकी हैं।

  • टिहरी नरेश से शुरू हुई परंपरा की शुरुआत – जौनपुर की अद्भूत लोक संस्कृति को देखकर  ही तब टिहरी नरेश सुदर्शन शाह ने वर्ष 1866 में ने इसी स्थान पर पहुंचकर मौण मेला की शुरूआत कर दी थी। तब से लेकर आज तक उसी उत्साह के साथ मौण मेला मनाया जाता है। मौण मेले के दौरान पकड़ी गई मछलियां खास तौर से टिहरी नरेश को भेजी जाती थी, लेकिन राजशाही समाप्त होने के बाद भी यह सिलसिला भी समाप्त हो गया,  मौण मेला Maun Festival आज भी क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाता है। जिसमे भरी संख्या में स्थानीय और बहरी लोग  सम्मिलित होते हैं।

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