क्या उत्तराखंड (Uttarakhand) में सुरक्षित (Safe) हैं महिलाएं (Women)?

क्या उत्तराखंड में सुरक्षित हैं महिलाएं ?

उत्तराखण्ड का नाम आते ही याद आता है पहाड़ी नारियों का कठिन जीवन।  कई दूर से पैदल चलकर पानी लेकर आना।  पहाड़ों में खेती करते समय खूब परिश्रम करना।  जान दांव पर रखकर जंगल से पालतू जानवरों के लिए घास लेकर आना। जंगल से लकड़ियां लाना। बहुत ही विषम और कठिन परिस्तिथियों में जीवंत रहती हैं हमारे पहाड़ की नारियां।  इन कठिन परिस्तिथियों में भी आपस में परस्पर स्नेह और सभी को सम्मान दिया जाता था। और सच में उत्तराखंड देवभूमि का साक्षात् प्रतीक  था। और शास्त्रों में भी लिखा है “यत्र नार्यन्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता”।

इतना कठिन और विषम जीवन जीने के बाद भी कुछ वर्षों पूर्व तक पहाड़ में बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाएं सुनने को नहीं मिलती थीं। आम पहाड़ी जनमानस बड़ी सादगी में अपना जीवन यापन करता है और शायद इसीलिए उत्तराखंड के पहाड़ों को देवभूमि की संज्ञा दी गयी थी। वर्ष 2017 में महिलाओं के लिए उत्तराखंड राज्य को सुरक्षित राज्यों की श्रेणी में रखा गया था।  ऐसा उस वक्त की महिला एवं बल विकास मंत्रालय की जारी रिपोर्ट के अनुसार बताया गया था। उस रिपोर्ट के मानक थे महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी। उत्तराखंड को दिल्ली समेत 30 राज्यों की श्रेणी में 13वां  स्थान मिला था।

 लेकिन क्या उत्तराखडं का पहाड़ उतना ही सुरक्षित है जितना पहले हुआ करता था?

एक नजर वर्ष 2018 में  प्रकाशित बलात्कार केंद्रित ख़बरों पर.. (Source: अमर उजाला पत्र )

Uttarakhand rape amar ujala

  • चम्बा में किशोरी का आत्महत्या करना।
  • घनसाली में युवती को बहला फुसलाकर होटल ले जाना।
  • श्रीनगर में युवती का आत्महत्या करना।
  • उत्तरकाशी में किशोरी का बलात्कार कर हत्या।
  • पिथौरागढ़ में किशोरी का बलात्कार कर हत्या।
  • हरिद्वार में पर्यटक महिला के साथ दुष्कर्म एवं महिला पुलिसकर्मी का आत्महत्या करना।
  • और हाल ही में दिव्यांग बालिकाओं के शोषण का मामला भी सामने आया है
  • न जाने कितनी ही घटनाएं उत्तराखंड में विभिन्न जिलों में महिला सुरक्षा के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं।

अब प्रश्न केवल महिलाओं की सुरक्षा का ही नहीं वरन पॉक्सो एक्ट के मौजूदा प्रावधानों में परिवर्तन के लिए उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा हुई देरी भी है।

पॉक्सो एक्ट के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के लिए अधिकतम सजा उम्रकैद है, जबकि न्यूनतम सजा सात साल की जेल है। दिसंबर-2012 के निर्भया मामले के बाद कानूनों में संशोधन किए गए थे। त्रिवेन्द्र सरकार ने वादा तो किया है संसोधन का, लेकिन अभी तक संसोधन हुआ नहीं है।

पंजाब में हैं कड़े नियम 

पंजाब सरकार ने क्रिमिनल लॉ (अमेडमेंट) आर्डिनेंस, 2018 आईपीसी में किया है संशोधन:

  • 12 वर्षों से कम आयु की किशोरी  के साथ दुष्कर्म पर मौत की सजा।
  • 16 साल से कम आयु की लड़की के साथ दुष्कर्म पर कम से कम सजा उम्र कैद।
  • दुष्कर्म के लिए कम से कम दस साल की सजा।

कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर में भी किया गया संशोधन:

  • दुराचार के मामलों में जांच दो महीने में पूरी करनी होगी।
  • अपीलों के निपटारे के लिए छह महीनों का समय तय।

उत्तराखंड को भारत के कई हिस्सों में आज भी देवभूमि के नाम से सम्बोधित करते हैं।  ऐसे में पर्यटन प्रदेश का सपना देख रहे उत्तराखंड में महिला सुरक्षा एक बहुत बड़ा मुद्दा है। उत्तराखंड में महिला सुरक्षा को लेकर सख्त कानूनों की मांग आज लगभग सभी सामाजिक संगठन एकजुट हो कर रहे हैं।  कई लोग तो  पहाड़ में घुले बसे बाहरी लोगों पर सारी जिम्मेदारी थोप अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहें हैं। प्रश्न विक्षिप्त मानसिकता का है वो किसी की भी हो सकती है। उत्तरकाशी में हुई घटना इसका जीवंत उदाहरण है।

आज सरकार के साथ साथ आम जनमानस को भी सतर्क होने की आवश्यकता है।  पहाड़ में हुआ पलायन कई आपराधिक घटनाओं को प्रति दिन न्योता दिए जा रहा है। ऐसे में जहाँ कभी महिलाओं से सम्बंधित घटना, गांव समाज के भय से लोग सपने में भी नहीं सोचते थे आज पहाड़ों में लगभग हर माह सुनने को मिल रहीं हैं। और समाज के सामने बारम्बार एक ही यक्षप्रश्न खड़ा कर रही है कि क्या उत्तराखंड में सुरक्षित हैं महिलाएं?

यह भी पढ़ें :

लड़कियां छुपाती है लड़कों से ये दस बातें।

बेबी रानी मौर्य (Baby Rani Maurya) बनीं उत्तराखंड की 7वीं राज्यपाल (Governor)

क्या भारत है महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश?

Releated Post