डॉ राकेश चंद रमोला: एक परिचय

dr rakesh chand ramola

हे0 न0 बहुगुणा गढ़वाल विश्व विद्यालय के बादशाहीथौल परिसर में पढ़ने वाले छात्रों के लिए  यह व्यक्तित्व किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पर क्या आप जानते हैं आपके पास में रहने वाले विज्ञान के इस कर्मठ दूत के बारे में?

आइये बात करते हैं भारत के महान वैज्ञानिकों में से एक डॉ आर सी रमोला के बारे में:

डॉ राकेश चंद रमोला गांव रावतगांव, पट्टी रौणद रमोली , प्रताप नगर , प्रसिद्ध वैज्ञानिक व निदेशक सेंट्रल यूनिवर्सिटी कैम्पस।
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कभी -कभी आस- पास काबिल लोगों के रहते नजरअंदाज करने पर ग्लानि महसूस होती है। जबकि होते हैं वे विश्वस्तरीय।
ऐसे ही हैं राकेश चंद रमोला।तीसरी बार वे हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय बादशाहीथौल टिहरी परिसर के निदेशक/ इंचार्ज हैं। ये छोटी बात हो सकती है।बड़ी बात यह है कि भौतिकी के प्रोफेसर रमोला 30 साल से रेडॉन के एक वर्ड क्लास फेमस विज्ञानी हैं। वे चुपचाप काम करते हैं।और अक्सर विदेश उन्हें बुलाता है। जापान तो हर दो में बुलावे पर जाते हैं। विदेश में उनकी पूछ है।भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान लगातार आना जाना है।
नासा में वे लेक्चर दे चुके हैं। जो कि अपने आप में बड़ी ख्याति है।

वे अपना मत/ लेक्चर देकर, अपने कैम्पस में प्रकट हो जाते हैं। वे भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग के स्थाई सदस्य हैं। उनके काम को हमारा आज का मीडिया नहीं जानता।वो बिजी है। राजनेताओं के पीछे।

प्रोफेसर रमोला का जन्म लंबगांव के सामने रावतगांव में 1963 में हुआ। फिर प्रारम्भिक शिक्षा लंबगांव में हुई।एमएससी उन्होंने DBS कॉलेज देहरादून से की। पीएचडी गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर से। विषय था फ़िजिक्स। फिर रमोला रुके नहीं। यह जरुरी नहीं कोई व्यक्ति आईएएस, आईपीएस, आईएफएस नहीं है तो वह काबिल नहीं है। एक किस्म से देखा जाय तो रमोला इनसे ऊपर हैं। यदि वे अमेरिका में होते, किसी विभाग के सचिव, उप सचिव होते है।भारत मे इस तरह के एकेडमिक साइंटिस्ट को लाल फीता शाही के अधीन काम करना पड़ता है।

प्रोफेसर रमोला रेडियो धर्मिता पर इटली में 1988 से 2000, ऑस्ट्रिया में 90 से 92 , जर्मनी में 1991 से 2005, मार्च 2008 ,स्विट्जरलैंड में 1991, ताईवान में 2007, सलोवेनिया 1988 में जमीनी काम कर चुके हैं।करीब 15 साल का उनका विदेश में वैज्ञानिक का शानदार रिकार्ड रहा है।

  • रेडॉन यानी एक रसायनिक तत्व है। जिसका संकेत डद परमाणु संख्या 86 है। यह तत्व रेडियोधर्मी, रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन नोबल गैस है। इस पर प्रोफेसर रमोला का विश्वस्तरीय अध्य्यन है। उनके इंटरनेशनल जनरल में करीब 185 पेपर पब्लिस हो चुके हैं।
    गूगल स्कालर्स में RC ramola साईटेशन इंडेक्स में F इंडेक्स उनकी गणना 26 है। जबकि, 10 वाला विज्ञानी भी सफल और होनहार माना जाता है। 26 तो विज्ञान की भाषा में श्रेष्ठ माना है।
  • उनके रेडॉन के शोध पेपर को वर्ल्ड में 2400 से ज्यादा लोग कोड कर चुके हैं। साइटेशन मतलब गुणवत्ता दिखाता है। परमाणु ऊर्जा की उनके बेहतरीन शोध हैं।

1992 से उनके पास परमाणु ऊर्जा के अब तक हमेशा प्रोजेक्ट्स रहे हैं। वे 2005 से अभी तक सचिव न्यूक्लियर ट्रेक सोसाइटी ऑफ इंडिया है।लाइफ मेम्बर वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ साइंटिस्ट हैं। और 1993 से 1996 तक भारत सरकार के एटॉमिक एनर्जी बिभाग के गढ़वाल हिमालय के मुख्य शोध अन्वेषण रहे हैं। उन्होंने जापान, चीन, कोरिया, थाईलैंड, इंडिया पांच देशों के साथ इंटर नेशनल प्रोजेक्ट किया है। जिसकी रिपोर्ट ICRP (International Commission on Radiological Protection ) को भेजी गई है। जो रेडियो डिक्लेरेशन पॉलिसी बनाती है।यह भी बहुत बड़ा अचीवमेंट है।1995 में उन्हें विज्ञान में निपुणता के लिए डॉ ए के गांगुली पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उनके खाते में विज्ञान के बेहतरीन काम के लिए एक दर्जन से अधिक पुरस्कार आये हैं।

प्रोफेसर रमोला, की पारिवारिक पृष्ठभूमि साधारण है।उनके पिता श्री पूरण चंद रमोला हरियाणा सरकार में खण्ड विकास अधिकारी (BDO) थे। अब रिटार्यड के बाद गांव रावतगांव में रहते हैं।

बेटा अतिन रमोला जी, Wood stock School मसूरी में पढ़े हैं।उसके बाद वह Mc Gill University ,मॉन्ट्रियल कनाडा, इलेक्टिरकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने चले गए थे।अब वह कनाडा में इंजीनियर है।रमोला जी की पत्नी रजनी रमोला जी नई टिहरी के मशहूर इंग्लिश स्कूल में वर्षो तक टीचर रही हैं। रमोला जी अपने गांव जाते रहते हैं।

1992 में रमोला जी ने गढ़वाल यूनिवर्सिटी स्वामी राम तीर्थ परिसर टिहरी में लेक्चर / सीनियर लेक्चर में सेवाएं शुरु की। 2001 में वे रीडर / प्रोफेसर बने। लगातार वे तीसरी बार 2013 से सेंट्रल यूनिवर्सिटी कैम्पस बादशाहीथौल के निदेशक/ इंचार्ज हैं।

वे अक्सर देश/ विदेश में विज्ञान के छेत्र में वर्कशाप, संगोष्टी, लेक्चर, सरकारी मीटिंग में भागीदार बनते हैं। रेडॉन के विषय में उन्हें अमेरिका, यूरोप,जापान बहुत बारीकी से जानता है। लेकिन वह रहते हैं पेड़ो से लकदक पहाड़ बादशाहीथौल में। शांति से। वह व्यवहारिक, साधारण दिखने वाले, असाधरण वैज्ञानिक हैं।

Source: शीशपालगुसाईं जी की facebook वाल से

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