आखिर कैसे हुआ दीपावली पर पटाखों का प्रचलन

दीपावली जैसा कि नाम से ही विदित है कि दीपों का त्यौहार है। फिर कैसे इस त्यौहार में पटाखों का प्रचलन प्रारम्भ हुआ? कैसे हिन्दुओं का सौहार्द और प्रेम के प्रतीक इस त्यौहार में पटाखों के शोर शराबे और बारूद के धुंए ने जगह ले ली ? आइये जानते हैं इतिहास के झरोखे से :

यदि करीब से देखा जाये तो दीपावली का पटाखों के साथ का दौर वैसे ही शुरू हुआ जैसे प्यार का इजहार करने के लिए हीरे की अंगूठी का। यह चमत्कार शिवकाशी (Shivkashi) के दो चालाक व्यापारियों की बुद्धिमत्ता का परिणाम था।  वह व्यापारी थे अय्या नादर (Ayya Nadar) और उनके भाई शंमुगा नादर (Shanmuga Nadar)

मुगल काल से पहले कभी भी दीपावली का जश्न मनाने के लिए आतिशबाजी का उपयोग करने का कोई विवरण नहीं है। मुगल युग के दौरान, दीपावली मुख्य रूप से लैंप का उपयोग करके मनायी  जाती  थी; और, गुजरात के कुछ  क्षेत्र तक ही सीमित थी चमकदार आतिशबाजी। (औरंगजेब ने 1667 में दीपावली के लिए दीपक और आतिशबाजी दोनों की सार्वजनिक प्रदर्शनी पर प्रतिबंध लगा दिया था।) मुगलों के बाद, अधिकांश ब्रिटिश शासनों के लिए, कड़े विस्फोटक अधिनियम ने पटाखे बनाने के लिए कच्चे माल के निर्माण और बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया।

बात 1923 की है जब अय्या नादर और शन्मुगा नादर ने आज के पटाखों के कारोबार का बीज बोया। दरअसल बात तब की है जब ये दोनों भाई अपनी किस्मत आजमाने कलकत्ता आ गए। एक माचिश की फैक्टरी में काम सीख कर उन्हें अपने भाग्य को बदलने का रास्ता मिल गया। दोनों भाई अपने पैतृक गांव शिवकाशी लौट आये और फिर शुरुआत की एक माचिश बनाने की कंपनी की। दोनों भाइयों ने लगभग पूरे भारत में अपने कारोबार को बढ़ाने का पूरा प्रयास किया।

बात 1940 की है जब विस्फोटक अधिनियम में संसोधन किया गया और एक निश्चित वर्ग के बारूद के लिए पटाखे बनाने का काम क़ानूनी हो गया। नादर बंधुओं ने इस मौके को दोनों हाथों से भुनाया और 1940 में शुरू हुआ पहला पटाखों का कारखाना।

अब पटाखे का कारोबार कैसे बढे इसके लिए नादर भाइयों के लिए जरुरी था इसे किसी संवेदना से जोड़ना और उन्होंने ऐसे ही किया। नादर भाइयों ने दीपावली को आतिशबाजी के साथ जोड़ने के लिए दिन रात एक कर दिए,और माचिस उद्योग से फैली उनकी राष्ट्रव्यापी छवि ने उन्हें ऐसा करने का अवसर दिया। शिवकाशी में आतिशबाजी उद्योग बड़ी तेजी से फैला फूला। एक रिपोर्ट के अनुसार 1980 तक अकेले शिवकाशी में पटाखों के 189 कारखाने थे, पूरे भारत में शिवकाशी के पटाखों की धूम थी,  देश भर में यहाँ से पटाखों की आपूर्ति की गई थी।

आज कई लोगों के लिए पटाखों के साथ दीपावली का त्यौहार धार्मिक महत्ता से जुड़ा है। लेकिन पटाखों और दीपावली का सम्बन्ध 1940 से पुराना नहीं है।

अब कोई भी उपक्रम जो बहुत कम समय में अपने शीर्ष पर पंहुचा हो बिना खूनी निशान छोड़े आगे नहीं बढ़ सकता। जब डी बीयर ने सगाई और विवाह समारोहों के लिए हीरे के छल्ले डी रेगुर बनाए, तो उन्होंने क्रांतिकारी उपभोक्तावाद की चमक को आग दी। जो आज कांगो,अंगोला, लाइबेरिया और आइवरी कोस्ट जैसे देशों में पारिस्थितिकीय विनाश और राजनीतिक विनाश के लिए ज़िम्मेदार है। जिसे रोकने का कोई संकेत नहीं दिखता है। इसी तरह, शिवकाशी में आतिशबाजी उद्योग बाल श्रम, व्यावसायिक मौत और अक्षमता, और अपने गृह नगर में जाति के तनाव को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार था; और यह पूरे देश में बच्चों और जानवरों के लिए शोर, धुआं, प्रदूषण और एक भयानक दिन की विरासत छोड़ देता है।

दीपावली रोशनी का त्यौहार है; और रात के अंधियारे में दीपों की जगमग रौशनी से भरे घर और नगर बड़े ही सुन्दर दिखाई देते हैं और इस शुभ दिन के लिए यह आवश्यक भी है। लेकिन जब आप इस दिन पटाखे  खरीदते और फाड़ते  हैं, तो आप जो भी कर रहे हैं वह दुनिया को यह घोषणा कर रहा है कि आप भी नादर भाइयों द्वारा 1940 में हुए घोटाले से सहमत हैं। इसमें कोई गर्व, सम्मान या आध्यात्मिक इनाम नहीं है।

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