ऐतिहासिक कुंजापुरी मेले का हुआ शुभारम्भ

historical kunjapuri fair

1925 में नरेंद्रनगर (Narendranagar) अपने नाम से महाराजा नरेंद्र शाह ने बसाया था। उससे पहले उसका नाम ओड़ाथली था। उस दौरान ओड़ाथली (Odathali) नरेंद्र शाह किसी को बोलने नहीं देते थे। नरेंद्र शाह की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। फिर उनका पुत्र श्री मानवेन्द्र शाह 1946 में गद्दी में विराजमान हुए। ढाई साल राजा रहने के बाद, नरेंद्रनगर से जनता की सरकार प्रजा मंडल 1 साल 5 माह चली। यह गवर्नमेंट दो जिलो की थीं। 1 अगस्त 1949 को रियासत का विलीनीकरण भारत मे कर दिया गया। तब से यह दो जिले उत्तर प्रदेश में आ गये।

नरेंद्र शाह, मानवेन्द्र शाह ने 1928 में 1953 तक नरेंद्रनगर नोटिफाइड एरिया, का ठा जगत सिंह पंवार, श्री मेदनी धर डंगवाल, श्री ईस्वरी दत्त रतूड़ी, श्री शेर सिंह पुंडीर को अध्यक्ष पद पर अलग अलग सालों में नामित किया था। आज़ाद भारत में सबसे पहले 23 नवम्बर 1953 को ठा किशोर सिंह पंवार, अध्यक्ष बने। जो 1964 तक रहे। फिर 10 दिसम्बर 1964 को श्री शिव लाल भंडारी को कमान मिली। उनका 30 अगस्त 1977 तक कार्यकल रहा। 10 दिसम्बर 1988 को एडवोकेट श्री सोबन सिंह नेगी चेयरमैन बने। 16 जनवरी 1994 तक रहे। फिर प्रशासक कार्यकाल। फिर 3 अप्रैल 1997 को पुनः चेयरमैन बने। तीसरे कार्यकाल में उनकी पत्नी श्रीमती बिमला नेगी 8 मार्च 2002 को चुन ली गई। जो 8 मार्च तक 2007 तक रही। फिर 2007 से 2012 तक राजेन्द्र सिंह राणा चेयरमैन रहे। फिर उनकी पत्नी श्रीमती दुर्गा राणा 2013 से 2018 के बीच चेयरमैन रही। इस प्रकार 1928 से 2018 तक 90 तक का नरेंद्रनगर पालिका यह इतिहास है। 1975 में नरेंद्र नगर को उत्तर प्रदेश के गवर्नर श्री चिना रेड्डी ने नरेंद्रनगर को नगर पालिका घोषित किया था।

1974 में श्री सुरेन्द्र सिंह पांगती (Surendra Singh Pangati)टिहरी गढ़वाल जिले के डीएम थे। जिला मुख्यालय था नरेंद्रनगर। उन्होंने कुंजापुरी पर्यटन विकास मेले की नींव रख कर शुरुआत की। कुंजापुरी के पुजारी और नेता श्री धर्म सिंह भण्डारी (Dharm Singh Bhandari) का भी योगदान रहा। 1974 से आज के दिन नवरात्र में कुंजापुरी जो सिद्धपीठ है। में पूजा अर्चना होती है। और करीब 10 मील दूर नरेंद्रनगर में 8 दिन तक मेला चलता है। दिन में स्पोर्ट्स, रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं। प्रारंभ में स्कूली बच्चों की झांकिया मनमोहक होती है। एक पहले इसकी ट्रेनिगं शुरू हो जाती है। अष्टमी को मेला खत्म होता है। साल भर लोगों को इस मेले का इंतजार रहता है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद इस मेले की प्रषांगिकता बढ़ी है। यधपि 1977 में चीफ मिनिस्टर उत्तर प्रदेश श्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने यहां पहुँच कर इस मेले का उद्घाटन किया। गवर्नर श्री चीना रेड्डी भी इस मेले में शिरकत कर चुके हैं। इस ऐतिहासिक मेले का उद्घाटन लगभग उत्तराखण्ड का हर मुख्यमंत्री कर चुका है। दिनांक 10 अक्टूबर 2018 को श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत (Trivendra Singh Rawat) ने किया। राज्य बनने के नरेंद्रनगर VIP लाने में विधायक श्री सुबोध उनियाल (Subodh Uniyal) का हाथ रहा है। उन्होंने मेले के लिए एक विशाल हॉल का भी निर्माण भी कराया। और न्यू कलेवर दिया।

trivendra singh rawat Historical kunjapuri fair
Trivendra Singh Rawat Historical kunjapuri fair

मेले में खूब रौनक रहती है। अष्टमी के बाद शहर वीरान हो जाता है। शहर के सामने जो गांव थे वे शहर बन गए।और नरेंद्रनगर धुंधला पड़ने लगा। मुनिकीरेती, 14 बीघा,ढालवाला, नगर पालिका सबसे बड़ी पालिका परिषद है। 14 किलोमीटर पास यह सबसे बड़ा उदाहरण है। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि,1989 में मुख्यालय नई टिहरी चला गया। यूपी सरकार पर डैम निर्माता thdc का दबाब था। फिर नेता जी सुबोध के पास उस वक्त ताकत नहीं थीं। जिस शहर के लोगों ने 62 साल तक राजधानी , जिला मुख्यालय( 1960 तक उत्तरकाशी जिले का भी ) देखा हो, उनके सामने कार्यालयो की शिफ्टिंग कितनी कस्ट दायक रही होगी। यह आप अंदाजा लगा सकते हैं।

historical kunjapuri fair
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बागेस्वर, चंपावत, रुद्रप्रयाग 16 सितंबर 1997 में जब मायावती ने जब जिले बनाये, उसमें चौथा नाम नरेंद्रनगर का भी था। प्रस्तावित जिले में ऋषिकेश,रायवाला, डोईवाला,यमकेश्वर छेत्र शामिल थे। देहरादून के डीएम श्री भूपेंद्र सिंह ने खसरे नक़्शे लखनऊ भिजवाये थे। नरेंद्रनगर से सुबोध उनियाल, सोबन सिंह नेगी मायावती को मिले भी थे। मायावती का एन वक्त में मूड चेंज हो गया। जिले बनने के ग्रह योग नहीं थे। बन जाता, बन जाता। अब मुश्किल है। लेकिन श्री वाचीस्पति रयाल ,श्री सोबन सिंह नेगी,श्री वीरेंद्र सिंह कंडारी, को आसान लगता है। तभी वो संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि नरेंद्रनगर विधानसभा में मौजूदा समय में ऑल वेदर रोड़, रेल परियोजना के 4 हज़ार करोड़ के काम हो रहे हैं। जो MLA और मंत्री उनियाल के लिए फायदेमंद है।दोगी सड़क पहुँच गई है। लेकिन शहर के बाशिंदे उदास ह्रदय से बैठे है।

1974 में इस मकसद से मेला शुरू हुआ कि, कार्यालयो का विकास होगा। यहाँ से उल्टा जिला मुख्यालय चला गया। SCRT चला गया। बन निगम मुख्यालय चला गया। पुलिस लाइन चले गई। DFO ,समाज कल्याण कार्यालय चला गया। राज्य पुलिस ट्रेंनिग कॉलेज जरूर आया। एक पहलू यह भी है कि नरेंद्रनगर से देहरादून नजदीक है।आदमी पूरे काम निबटा कर इविंनिग की चाय अपने घर पी सकता है। राज्य बनने के बाद, शहर से पलायन भी हुआ है। काफी कर्मचारी देहरादून, ऋषिकेश बस गए हैं। जो नरेंद्रनगर हैं वे बड़े विद्वान रह गए हैं। वे दिन में अमेरिका को तक पढ़ लेते हैं। लेकिन, देहरादून में 80 से अधिक उम्र में भी सक्रिय श्री सुरेन्द्र सिंह पांगती को सलाम। जिन्होने इस मेले की शुरुआत की थीं। जो ऐतिहासिक बन गया है। अच्छे काम का असर, बड़ी दूर तक रहता है।यही कारण रहा होगा राजमाता कमलेन्दुमति शाह ने अपने बेटों को ट्रस्ट का उत्तराधिकारी नहीं बना कर पांगती जी बनाया था।

Source: शीशपाल गुसाईं जी की Facebook wall से

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