गोबर के सामने माॅडर्न साइंस के सूत्र टूटे

न्यूज़ ब्यूरो। धरती में सबसे मूल्यवान आॅक्सीजन है। मानव को एक सेकंड भी आॅक्सीजन न मिले तो इस शरीर का जिंदा रहना मुश्किल है। इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। शरीर के स्वास्थ्य का सीधा रिश्ता आॅक्सीजन के साथ होता है। मगर चिंता की बात यह है कि पूरी दुनिया में आॅक्सीजन का घनत्व लगातार घट रहा है। जिसके कारण लोग बीमारियों की चपेट में अधिक आ रहे हैं। शोधकर्ताओं की मानें तो पूरी दुनिया में तेजी के साथ बढ़ती बीमारी का एक अहम कारण आॅक्सीजन का घटता घनत्व है।

यदि दुनिया में आॅक्सीजन के घनत्व को बढ़ाना है तो कोई भी मशीन या यंत्र नहीं बन सकता है, जिससे हाईड्रोजन या कार्बन का रूपांतरण प्राण वायु के रूप में हो सके। इसका एक ही मार्ग है, भारतीय नस्ल की गाय। गाय के गोबर में आॅक्सीजन होता है। गाय सूर्य की किरणों से ऊर्जा लेकर गोबर में आॅक्सीजन का रूपांतरण कर देती है।

मनुष्य को जीने के लिए 21 प्रतिशत आॅक्सीजन की जरूरत होती है। जिन क्षेत्रों में आॅक्सीजन की कमी होती है वहां लोग ज्यादा बीमार होते हैं। मेट्रो स्तर के शहरों में करीब 13 से 15 प्रतिशत आॅक्सीजन रहता है।  साफ-सुथरे गांव में 17 प्रतिशत आॅक्सीजन होता है। हिमालय में 19 से 20 प्रतिशत आॅक्सीजन होता है। पूरी दुनिया के वायुमंडल में 21 प्रतिशत से ज्यादा कहीं भी आॅक्सीजन नहीं है। बावजूद इसके गाय के कच्चे गोबर में 23-24 प्रतिशत आॅक्सीजन होता है। विज्ञान कहता है कि 21 प्रतिशत से ज्यादा आॅक्सीजन कहीं नहीं हो सकता है। लेकिन दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर में भी गाय के गोबर का रासायनिक परीक्षण कर 23 प्रतिशत आॅक्सीजन पाया गया है।

आज का माॅडर्न साइंस कहता है कि किसी भी वस्तु का प्रोसेस करने पर प्रोसेस लोस होता है। मगर गाय के किसी भी गव्य के प्रोसेस में प्रोसेस लोस नहीं होता है। गाय के कच्चे गोबर में 23 प्रतिशत आॅक्सीजन होता है। इसके बाद जब गोबर को धूप में सूखाकर रासायनिक परीक्षण किया गया तो 27 प्रतिशत आॅक्सीजन हो गया। इसके बाद कोयला बनाने पर 30 प्रतिशत आॅक्सीजन तथा पूरी तरह से जला देने पर 46 प्रतिशत आॅक्सीजन हो गया।

 

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