Ghantakarna Mandir Mahayatra – द्वितीय घण्टाकर्ण महायात्रा का आयोजन 20-21 June 2018

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Ghantakaran Mahayatra | Second Mahayatra 20 june to 21 Jun 2018

टेहरी गढ़वाल :  घण्डियाल डंडा क्वीली , नरेंद्रनगर टेहरी गढ़वाल में पिछली बार की तरह इस बार भी घण्टाकर्ण महायात्रा का आयोजन किया जा रहा है. यह द्वितीय महायात्रा है जो की  २० जून से लेकर २२ जून तक चलेगी। जिसमे प्रत्येक साल हजारों  श्रद्धालु गण  भाग लेते  है।

श्री घंडियाल देवता एक पौराणिक  मंदिर है. घंडियाल देवता हिन्दू एवं जैन धर्मावलम्बियों के द्वारा पूजित प्रमुख देवता हैं।  श्री घंटाकर्ण धाम की परंपरा के अनुसार प्रत्येक तीन  वर्षो में मंदिर की जात ( यात्रा ) श्री घंटाकर्ण महायात्रा का आयोजन किया जाता है

Ghantakaran Mahayatra 2018 HIGHLIGHTS 

घण्टाकर्ण महायात्रा –

  • २० जून – ऋषिकेश के लिए प्रस्थान
  • २१ जून – को हरिद्वार के लिए प्रस्थान
  • २२ जून – को श्री घंटाकर्ण धाम में जलाभिषेक और पूर्णाहुति के साथ भंडारे का आयोजन
Ghantakaran second mahayatra 2018
Ghantakaran second mahayatra 2018

घण्टाकर्ण महायात्रा  कार्यक्रम में मुख्य अतिथि स्थानीय विधायक एवं मंत्री सुबोध उनियाल रहेंगे जबकि विशिष्ट अतिथिगण में मोहन सिंह रावत (गाउँवाशी ) पूर्व मंत्री  , लाखी राम जोशी  पूर्व मंत्री , शूरवीर सिंह सजवाण पूर्व मंत्री  , विक्रम सिंह सजवाण आईएफएस  , ओमगोपाल रावत पूर्व विधायक  , हिमाशु  बिजल्वाण  जिलाध्यक्ष कांग्रेस रहेंगे।

जबकि  कार्यक्रम  अध्यक्ष वत्सल शर्मा , वरुण शर्मा  , महायात्रा संयोजक – ज्योति सजवाण , वीर सिंह रावत , समिति – बंशीलाल चांदपुरी अध्यक्ष  , एस एस राणा सचिव  श्री घण्टाकर्ण महायात्रा कार्यक्रम के सफल संचालन को देख रहे हैं। 

 

 ऐसा दिखता है घंडियाल देवता मंदिर- 

ghandiyaldevta_temple mahayatra

घंटाकर्ण की कथा 

वैसे श्री घंटाकर्ण की उत्पत्ति को लेकर लोगों में कई तरह की किवदंतियां प्रचलित है, किन्तु हरिवंश पुराण (पंचम स्कंध) में इनकी कथा विस्तार से बताई गयी है, जिसके अनुसार घंटाकर्ण जन्म से एक राक्षस था और भगवान शिव का अनन्य भक्त था।

भगवान शिव पर अपनी अनन्य भक्ति के चलते इन्हें किसी भी दुसरे देवी देवता का नाम सुनना पसंद ही नहीं था, किसी और देवता का नाम इनके कानो को सुनाई ना पड़े इसलिए इसने अपने कानो में बड़े बड़े घंटे धारण किये हुए थे।

घंटाकर्ण की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने इन्हें स्वयं दर्शन दिए और और वर मांगने को कहा, वरदान स्वरुप घंटाकर्ण ने अपनी मुक्ति की इच्छा रखी वो अपने राक्षसी जीवन से संतुष्ट नहीं थे।  उनकी इच्छा सुन भगवान्  शिव ने कहा की तुम्हे अगर कोई मुक्ति दे सकता है तो वो है भगवान् विष्णु, तुम्हें उनकी शरण में जाना होगा। ये सुनकर घंटाकर्ण उदास हो गया क्यूंकि वो तो भगवान् विष्णु का नाम भी नहीं सुनना चाहता था।  उसकी परिस्थिति को समझकर भगवान् शिव ने उसे एक उपाय सुझाया  द्वारिका जाने के लिए कहा, जहाँ भगवान् विष्णु कृष्ण रूप में अवतरित होकर रह रहे थे।

शिवजी के आदेशानुसार घंटाकर्ण जब द्वारिका पहुंचा तो उसे वहां पता चला की भगवान् कृष्णा तो कैलाश गए हुए हैं, जहाँ वो पुत्र प्राप्ति की कामना हेतु शिवजी की तपस्या कर रहें हैं। यह सुनकर घंटाकर्ण भी कैलाश की ओर चल पड़े और जब वो बद्रिकाश्रम पहुंचे तो उसने वहाँ श्रीकृष्ण को समाधि में लीन पाया।  वो वहीं बैठकर जोर जोर से नारायण के नाम का जाप करने लगा जिस कारण श्रीकृष्ण का ध्यान टूट गया और उन्होंने घंटाकर्ण से उनके वहां कारण पूछा।  घंटाकर्ण ने उन्हें सारा वृत्तांत कह सुनाया और उनसे मुक्ति की प्रार्थना की, कृष्णा उनकी भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और नारायण के रूप में अवतरित होकर उन्होंने घंटाकर्ण पिसाच योनि से मुक्त किया और साथ ही उन्हें बदरीनाथ का द्वारपाल भी नियुक्त किया।
तभी से भगवान् घंटाकर्ण या घंडियाल देवता को बदरीनाथ छेत्रपाल भी माना जाता है

 

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