भारत में ‘Facebook’ की प्रासंगिकता

facebook relevance in india

‘फेसबुक’ की प्रासंगिकता

फेसबुक आज भारत के लगभग सभी इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों में अपनी पंहुच बना चूका है। 2004 में दुनिया में आने वाला फेसबुक सारे भारत में अपने पैर पसार चूका है। आज के दौर में फेसबुक भारतीय समाज में क्या अहमियत रखता है इस पर कुछ विचार :

  1. सर्वप्रथम ‘फेसबुक’ को एक द्रुतगामी, अनियमित, व्यक्तिगत अखबार के रूप में लिया जा सकता है जिसका संपादन,लेखन,विचार,भाषा शैली व्यक्ति की स्वयं की होती है,जिसपर उसका पूर्णतः एकाधिकार होता है।
  2. कहने को तो यह ‘फेसबुक’ है किंतु व्यक्ति के मनोविज्ञान,चरित्र,दर्शन को भी यह बिना देखे,मिले ही समझने में भी सहायक है।
  3. इसमें उतार-चढ़ाव और अस्थिरता बहुत है।किसी एक पोस्ट पर ढेर सारी प्रतिक्रिया/लाइक(जन्मदिन,सालगिरह,अच्छे लेख आदि) मिलते हैं तो किसी में लगभग नहीं के बराबर ।इसलिए चैतन्य व समान भाव वाले यहाँ सफल होते हैं।अपेक्षा रखने वालों के लिए सुख-दुःख यहां बराबर बने रहते हैं।
  4. हर किसी के विचारों में भिन्नता होती है।किन्तु जिनके विचार यहाँ मिल जाते हैं वे एक प्रशंसक की तरह आपस में क्रिया-प्रतिक्रिया देते हैं। यहाँ जुड़े हर व्यक्ति को यह उम्मीद रहती है कि उसके विचारों को तरज़ीह मिले,प्रतिक्रिया मिले,जब ऐसा नहीं होता तो उसे निराशा मिलती है,और कभी छोड़ जाने का एक कारण भी।
  5. व्यक्ति जब ‘फेसबुक’ से जुड़ता है तो संभवतः इसीलिए कि इसके माध्यम से कुछ अच्छे लोगों से जुड़ पायेगा, नवीन जानकारियां,तथ्य,विचार आदि प्राप्त हो सकेंगे, लेकिन जब ज्यादा राजनीति देखने को मिलने लगती है,तब निराशा ही मिलती है।अच्छी खबरें यहाँ जल्दी फैलती हैं तो बुरी या अपूर्ण खबरें उससे भी जल्दी,जो विश्वास को कम करती हैं।
  6. अधिकांश लोगों के लिए एक प्रश्न यहाँ अनुत्तरित ही है कि यदि किसी की मित्रता सूची में 4000,5000 लोग हैं तो अधिकतम प्रतिक्रियाये /लाइक 800,1000 तक ही आ पाते हैं।अब यह बचे हुए 3000,4000 लोग कौन हैं ? जिन्हें अभी तक कोई समझ नहीं पाया।
  7. यहाँ यह ज़रूरी नहीं कि किसी ने बहुत सार्थक,महत्वपूर्ण लिखा हो,उसी हिसाब से उसे प्रतिक्रिया भी मिले ।कई बार साधारण पोस्ट ऊपर उठ जाती है और गंभीर विषय कहीं दब जाते हैं।तब गंभीर लिखने वालों में निराशा बढ़ती है।
  8. ‘फेसबुक’ से जुड़े जो लोग हैं वह स्वयं जानते हैं कि इसके प्रयोग में घण्टे, सेकेंडों में निकल जाते हैं।कुछ ठोस कार्य करने वालों के लिए यह जीवन का महत्वपूर्ण समय हर लेता है।अस्तु इससे जुड़ी मित्रता बहुत उद्देश्यपूर्ण भी हो सकती है और समय बर्बाद करने वाली भी।यह व्यक्ति के संबंधों और आपसी विचारों पर अधिक निर्भर करता है।इसका संतुलित प्रयोग फायदेमंद हो सकता है।
  9. ‘फेसबुक’ का फायदा वह व्यक्ति खूब उठाते हैं जो सामाजिक,राजनीतिक,देशहित से जुड़ी तमाम गतिविधियों में ‘फेसबुक’ से दूर सिर्फ अपने कार्यों का इसके माध्यम से प्रचार-प्रसार करते हैं ।अपनी ही पोस्ट पर केंद्रित रहते हैं ।वह किसी पोस्ट पर लिखते भी नहीं,लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए टैग कर लेते हैं ।ऐसे व्यक्ति न अपना समय देते हैं,न विचार,न भावनाओं के माध्यम से कोई अभिव्यक्ति।वह स्व केंद्रित होते हैं और इसके असल लाभार्थी।

एक सामान्य व्यक्ति के लिए ‘फेसबुक’ से जुड़े कुछ लाभ भी अंत में समझे जा सकते हैं।

  • बहुत शीघ्रता से किसी सूचना को देने व अपनी बात रखने का एक सशक्त माध्यम।
  • विभिन्न खबरों,कार्यक्रमों की यथासमय सूचना मिलते रहना।
  • चेहरे की किताब के साथ ही यह व्यक्ति के मनोभावों /चरित्र को समझने में भी सहायक।
  • कई भूले-बिसरे मित्रों को ढूंढने में सहायक।
  • अपने परिवारजनों व मित्रों के बीच विचारों,चित्रों,वीडियो आदि के माध्यम से संपर्कता /दूर बैठे भी अवलोकन और किसी न किसी रूप में जुड़ाव की स्थिति।

‘फेसबुक’ के ‘मेसेंजर’ व ‘व्हाट्सप्प’ पर यदि प्रतिदिन good morning/good night आदि भेजने के स्थान पर मात्र ज़रूरी जानकारी ही इसके माध्यम से दिए जाने के लिए इसका प्रयोग किया जाए तो बहुत उद्देश्यपूर्ण होगा और दोनों ओर से समय भी बचेगा जिसे कुछ ज़रूरी पोस्टों को देखने,विचार लिखने में भी लगाया जा सकता है। ‘फेसबुक’ का अधिक समय तो यही सब ले लेता है। ज़रूरी है कि ‘फेसबुक’ में कुछ सार्थक ही लिखा जाए, कम लिखा जाए,लोगों को भी पढ़ा जाय तो इसकी उपयोगिता तमाम इन तथ्यों के बाद भी ‘सार्थक’ है।

साभार:(Hema uniyal जी की फेसबुक वाल से )

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