बग्वाल : रक्षाबंधन पर यहाँ बहाया जाता है खून

Bloody festival Rakshabandhan

रक्षाबंधन का त्यौहार प्रेम और सौहार्द के त्यौहार के रूप में सम्पूर्ण विश्व में भारत की एक अलग  छाप छोड़ता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में एक जगह ऐसी भी है जहां रक्षाबंधन के पर्व पर आस्था के चलते पत्थरबाजी का खेल होता है। सुनने में थोड़ा अलग जरूर है लेकिन इसके पीछे छिपी है रोचक कहानी और यहाँ की देवी के प्रति लोगों की आस्था। यहां देवी के भक्त न सिर्फ एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं,  बल्कि बाद में गले मिलकर एक-दूसरे की कुशलक्षेम भी पूछते हैं।

आखिर कैसे और कहाँ आयोजित होता है यह पाषाण युद्ध 

भारत के पहाड़ी राज्य उत्तरांचल के चंपावत ज़िले के देवीधुरा कस्बे में आज भी आदिम सभ्यता जीवंत हो उठती है जब लोग ‘पाषाण युद्ध’ का उत्सव मनाते हैं।  एक-दूसरे पर निशाना साधकर पत्थर बरसाती वीरों की टोली, इन वीरों की जयकार और वीर रस के गीतों से गूंजता वातावरण, हवा में तैर रहे पत्थर ही पत्थर और उनकी मार से बचने के लिये हाथों में बांस के फर्रे लिये युद्ध करते वीर।  आस-पास के पेड़ों, पहाड़ों औऱ घर की छतों से हजारों लोग सांस रोके पाषाण युद्ध के इस रोमांचकारी दृश्य को देख रहे हैं।  कभी कोई पत्थर की चोट से घायल हो जाता है तो फौरन उसे पास ही बने डॉक्टरी कैंप में ले जाया जाता है।  युद्धभूमि में खून बहने लगता है, पत्थर की बौछार थोड़ी देर के लिये धीमी जरूर हो जाती है लेकिन ये सिलसिला थमता नहीं।  हर साल हजारों लोग दूर-दूर से इस उत्सव में शामिल होने आते हैं।

आस-पास के गांवों में हफ़्तों पहले से इसमें भाग लेने के लिये वीरों और उनके मुखिया का चुनाव शुरू हो जाता है।  अपने-अपने पत्थर और बांस की ढालें तैयार कर लोग इसकी बाट जोहने लगते हैं।  पुराने लोगों का कहना है कि,”सब चाहते हैं कि उनकी टोली जीते लेकिन साथ ही जिसका जितना खून बहता है वो उतना ही ख़ुशक़िस्मत भी समझा जाता है। इसका मतलब है कि देवी ने उसकी पूजा स्वीकार कर ली।”

क्या कहती हैं लोकगाथाएँ 

मान्यता है कि पहले मां वाराही देवी को खुश करने के लिए उनके मंदिर में नरबलि दी जाती थी। प्रतिवर्ष एक नरबलि की परंपरा थी और हर परिवार से बारी-बारी एक पुरुष की बलि होती थी। कहा जाता है कि एक वक्त ऐसा भी आया जब एक बुजुर्ग महिला की बारी आयी और उन्हें माता के दरबार में अपने बेटे की बलि देनी थी। उस बुजुर्ग महिला ने माता की अराधना की और उनसे कहा कि आपकी परंपरा को पूरा करने के लिए मैं अपने बेटे की बलि तो दे रही हूं, लेकिन इससे मेरे वंश का समूल नाश हो जाएगा। इसके बाद मां वाराही देवी ने उस बुजुर्ग महिला को आदेश दिया कि वह बग्वाल का आयोजन करवाए और पत्थरों की मार (बग्वाल) से प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा पर एक नरबलि के बराबर खून उन्हें चढ़ाए। इस प्रथा को आज भी बदस्तूर निभाया जाता है। यहां के लोगों का मानना है कि चंद शासन तक यहां श्रावणी पूर्णिमा को प्रतिवर्ष नरबलि दी जाती थी। 

आज भी जब पुजारी संतुष्ट हो जाता है कि एक व्यक्ति के बराबर ख़ून बह गया तभी बग्वाल का समापन होता है। पुजारी के शँखनाद के साथ ही जैसे ही इस युद्ध का समापन होता है सभी टोलियों के लोग एक-दूसरे से गले मिलकर खुशी मनाते हैं और घायलों की कुशलक्षेम पूछते हैं। सैलानियों के बीच भी बग्वाल का आकर्षण बढ़ता जा रहा है। दिल्ली,मुंबई,हरियाणा,पंजाब के साथ-साथ बड़ी संख्या में विदेशी भी इस अनोखे युद्ध को देखने इस समय यहां आते हैं। 

प्रशासन ने पिछले कुछ सालों के दौरान पत्थर फेंकने को लेकर सख्ती दिखायी है, जिसके बाद अब नाशपाती जैसे फलों का उपयोग ज्यादा होता है। निश्चित तौर पर यह मेला ऐतिहासिक है, लेकिन यह कितना पुराना है इसको लेकर अलग अलग मत हैं। इस बात को लेकर आम सहमति है कि नर बलि की परम्परा के अवशेष के रूप में ही बग्वाल का आयोजन होता है।

अन्य मान्यताएं जो मंदिर को बनतीं हैं खास 

यहां मुख्य मंदिर में एक ताम्र पेटी में रखी मां बाराही की मूर्ति अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए है।  आस्था के कारण कोई भी इंसान, मां की मूर्ति को खुली आँखों से नहीं देखता।  कहते हैं, जिसने भी इसे देखने की कोशिश की, उसकी आँखों की रौशनी चली गयी।  हर साल भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा को बागड़ जाति के क्षत्रीय वंशज ताम्र पेटिका को मुख्य मंदिर से नंद घर में लाते हैं।  यहां आंख पर पट्टी बांध कर मां का स्नान और श्रृंगार किया जाता है।

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