उत्तम साधक को तीन दिन में आत्म-साक्षात्कार हो सकता है !

सत्य बोलना, प्रिय बोलना, मधुर बोलना, हितावह बोलना और कम बोलना, जीवन में व्रत रखना, परहित के कार्य करना – इससे शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है। जिसके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण नहीं हुआ वह चाहे अपनी स्थूल काया को कितने ही-पाऊडर-लाली और वस्त्रालंकारों से सुसज्जित कर दे, लेकिन भीतर की तृप्ति नहीं मिलेगी, हृदय का आनन्द नहीं मिलेगा।

स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गये थे। उनके प्रवचन सुनने के लिए लोग इकट्ठे हो जाते। एक बार एक महिला आई। उसके अंग पर लाखों रूपये के हीरे जड़ित अलंकार लदे थे। फिर भी वह महिला बड़ी दुःखी थी। प्रवचन पूरा होते ही वह स्वामी रामतीर्थ के पास पहुँची और चरणों में गिर पड़ी।

बोलीः “मुझे शान्ति दो….. मैं बहुत दुःखी हूँ। कृपा करो।

स्वामी रामतीर्थ ने पूछाः “इतने मूल्यवान, सुन्दर तेरे गहने, वस्त्र-आभूषण ! तू इतनी धनवान ! फिर तू दुःखी कैसे ?”

“स्वामी जी ! ये गहने तो जैसे गधी पर बोझ लदा हो ऐसे मुझ पर लदे हैं। मुझे भीतर से शांति नहीं है।”

अगर शीलरूपी भूषण हमारे पास नहीं है तो बाहर के वस्त्रालंकार, कोट-पैन्ट-टाई आदि सब फाँसी जैसे काम करते हैं। चित्त में आत्म-प्रसाद है, भीतर प्रसन्नता है तो वह शील से, सदगुणों से। परहित के लिए किया हुआ थोड़ा-सा संकल्प, परोपकारार्थ किया हुआ थोड़ा-सा काम हृदय में शान्ति, आनन्द और साहस ले आता है।

अगर अति उत्तम साधक है तो उसे तीन दिन में आत्म-साक्षात्कार हो सकता है। तीन दिन के भीतर ही परमात्म तत्त्व की अनुभूति हो सकती है। जन्म-मृत्यु के चक्कर को तोड़कर फेंक सकता है। पृथ्वी जैसी सहनशीलता उसमें होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि इधर-उधर की थोड़ी- सी बात सुनकर भागता फिरे।

पृथ्वी जैसी सहनशक्ति और सुमन जैसा सौरभ, सूर्य जैसा प्रकाश और सिंह जैसी निर्भीकता, गुरूओं जैसी उदारता और आकाश जैसी व्यापकता। पानी में किसी का गला घोंटकर दबाये रखे और उसे बाहर आने की जैसी तड़प होती है ऐसी जिसकी संसार से बाहर निकलने की तीव्र तड़प हो, उसको जब सदगुरू मिल जाय तो तीन दिन में काम बन जाय। ऐसी तैयारी न हो तो फिर उपासना, साधना करते-करते शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना होगा।

वेद के दो विभाग है – प्रमाण विभाग और निर्माण विभाग। जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है ? इसका जो ज्ञान है उसे ‘वेदान्त’ कहते हैं। यह है प्रमाण विभाग। दया, मैत्री, करूणा, मुदिता, दान, यज्ञ, तप, स्मरण, परहित, स्वाध्याय, आचार्य-उपासना, इष्ट-उपासना आदि जो कर्म हैं, ये शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करते हैं। जिसके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण नहीं हुआ वह प्रमाण विभाग को ठीक से समझ नहीं पाता, प्रमाण विभाग का आनन्द नहीं ले पाता। सत्कर्म, साधन, आचार्योपासना आदि करते-करते साधक प्रमाण विभाग का अधिकारी बन जाता है।

आज कल हम लोग प्रायः निर्माण विभाग के अधिकारी हैं। कीर्तनादि से शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है, सदभाव भाव का निर्माण होता है। सदभाव कहाँ से होता है ? शुद्ध अन्तःकरण से। सोने-चाँदी के गहनों से देह की सजावट होती है और कीर्तन आदि से शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है। देह की अपेक्षा अन्तःकरण हमारे ज्यादा नजदीक है। बाहर के गहने खतरा पैदा कर देते हैं जबकि कीर्तन, ध्यानरूपी गहने खतरों को भी खतरा पहुँचा देते हैं। अतः शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करने वाला शील ही सच्चा आभूषण है।

शील में क्या आता है ? सत्य, तप, व्रत, सहिष्णुता, उदारता आदि सदगुण।

आप जैसा अपने लिए चाहते हैं, वैसा दूसरों के साथ व्यवहार करें। अपना अपमान नहीं चाहते तो दूसरों का अपमान करने का सोचें तक नहीं। आपको कोई ठग ले, ऐसा नहीं चाहते तो दूसरों को ठगने का विचार नहीं करें। आप किसी से दुःखी होना नहीं चाहते तो अपने मन, वचन, कर्म से दूसरा दुःखी न हो इसका ख्याल रखें।

प्राणि मात्र में परमात्मा को निहारने का अभ्यास करके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना यह शील है। यह महाधन है। स्वर्ग की संपत्ति मिल जाय, स्वर्ग में रहने को मिल जाय लेकिन वहाँ ईर्ष्या है, पुण्यक्षीणता है, भय है। जिसके जीवन में शील होता है उसको ईर्ष्या, पुण्यक्षीणता या भय नहीं होता। शील आभूषणों का भी आभूषण है।

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